इंग्लिश रीडर किन मानकों पर है खरी

लेखक:   शिवानी तनेजा
अनुवाद: अचलेश शर्मा

पाठ्य पुस्तक समीक्षा
वर्तमान शिक्षा प्रणाली, यहाँ तक कि प्राथमिक कक्षाओं में भी, पुस्तकों पर आधारित परीक्षा पद्धति द्वारा एक निर्धारित समय सीमा के भीतर पाठ्यक्रम को ‘निपटा’ दिए जाने को ध्यान में रखकर संचालित होती है। चाहे प्राइवेट स्कूल हों या सरकारी स्कूल, कहीं भी अध्यापकों को इतना मौका ही नहीं मिल पाता कि स्कूल प्रबन्धन द्वारा निर्धारित पाठ्य पुस्तकें पढ़ाने के अलावा वे अपनी तरफ से कुछ भी पढ़ा या बता सकें – चाहे वह कोई अन्य पुस्तक हो या कोई कहानी आदि। इसी वजह से यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि हमारी पाठ्य पुस्तकें उत्कृष्ट गुणवत्ता लिए हों। वे ऐसी हों जो सीखने के लिए प्रेरित करें और उसके लिए मददगार हों। किन्तु, मध्य प्रदेश राज्य की कक्षा पाँच की अँग्रेज़ी विषय की पाठ्य पुस्तक ऐसे किसी भी मानक पर खरा उतरने में पूरी तरह विफल रही है, जैसे उन बच्चों को अँग्रेज़ी सिखाने व पढ़ाने के पाठ तथा अभ्यास कैसे हों जो कि आदिवासी, दलित और हाशिए पर स्थित अन्य पृष्ठभूमियों से आते हैं।

प्रसंगाधीन पुस्तक के पहले दो पृष्ठों में इस पुस्तक के लक्ष्यों और विशिष्टताओं का वर्णन किया गया है। बड़े स्पष्ट और सुसंगत रूप से इन्हें कुछ इस प्रकार रखा गया है – किसी भाषा को सहज और प्रासंगिक तरीके से सीखना, सीखने वालों के सामने किसी नई भाषा को एक सरल और सम्प्रेषणीय ढंग से सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने के क्रमबद्ध तरीके प्रस्तुत करना। इस बात का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है कि इस पुस्तक को विशेष रूप से उन छात्रों के लिए डिज़ाइन किया गया है जिनकी पहली पीढ़ी अँग्रेज़ी सीख रही है। प्रस्तावना में यह बात भी स्वीकार की गई है कि अध्यापक भी इस भाषा के सुविज्ञ या अच्छे जानकार नहीं हैं।

इस लेख में यह चर्चा की गई है कि इस पुस्तक के सोलह पाठ किस प्रकार बच्चों के लिए वास्तव में बिलकुल उपयुक्त नहीं हैं।

विषय-वस्तु
पहला अध्याय ईश्वर का आभार प्रकट करने वाली एक प्रार्थना है। इस पाठ में प्रकृति द्वारा प्रदत्त चीज़ों के अलावा दूसरे पैरा में खोजकर घर की उन चीज़ों को रखा गया है जो ईश्वर बच्चों को उपलब्ध कराता है जैसे भोजन, वस्त्र, पुस्तकें इत्यादि। यह बात तो अच्छी है कि व्यक्ति को कृतज्ञ होना चाहिए किन्तु सोचने वाली बात यह भी है कि किसी के मन में ईश्वर की छवि एक दाता के रूप में क्योंकर बिठा दी जाए। धर्म भले ही समाज के एक-एक अंग में बड़ी गहराई तक और बड़ी मज़बूती से रच-बस गया हो किन्तु शिक्षा प्रणाली के माध्यम से वह किसी पर लादा या थोपा जाना जायज नहीं। वैसे भी, सरकारी स्कूलों में आने वाले अधिकांश बच्चों को अपने परिवार को सहयोग देने के लिए कुछ-न-कुछ बाहर का काम करना पड़ता है। वे ऐसे मकानों में रहते हैं जिनसे उन्हें कभी भी बेदखल कर दिए जाने, बाहर निकाल दिए जाने के खतरे की तलवार हमेशा सर पर लटकती रहती है, और वे कई बार विस्थापित भी हो चुके होते हैं। बरसात में उनके घर की छत टपकती है और पढ़ने के लिए उनके पास किताबें भी नहीं हैं – न घर में और न ही स्कूल में। उन्हें अकसर भूखे पेट सोना पड़ता है, या केवल मक्के की लपसी से गुज़ारा करना पड़ता है। ऐसे में आखिर धन्यवाद किस बात के लिए? ऐसे धन्यवाद और आभार प्रकट करती प्रार्थनाएँ तो भरे-पेट मध्यम वर्गीय समाज से ही उपज सकती हैं।

तीसरा अध्याय बच्चों द्वारा जन-शिक्षा केन्द्र के एक ‘हेडस्टार्ट’ सेंटर को जाकर देखने के बारे में है जहाँ बच्चे कम्प्यूटर पर भाषा सीखते हैंं। राज्य शिक्षा केन्द्र द्वारा यह मान लेना मूर्खता है कि पुस्तक में अध्याय डाल देने भर से वह क्रियान्वित हो जाएगा। इस अध्याय में एक चर्चा दिखाई गई है जिसमें बच्चें बताते हैं कि वे कम्प्यूटर पर कौन से विषय सीख चुके हैं और अगले सप्ताह कौन से सीखने वाले हैं। इस अध्याय को पुस्तक में डालने का प्रयोजन यदि बच्चों को यह बताना है कि कम्प्यूटर में मल्टी मीडिया कार्यप्रणाली भी होती है तो फिर यह सब किताबों के माध्यम से क्यों किया जा रहा है। यदि इसका प्रयोजन उन चीज़ों पर चर्चा करना है जो कि स्कूल के माध्यम से बच्चे के जीवन में हो रही हैं, फिर तो हमें और भी यथार्थवादी होने और ऐसी बातों को स्कूल की ही दिन-प्रतिदिन की सामान्य घटनाओं में से लिए जाने की आवश्यकता है। यह अध्याय इस बारे में भी हो सकता था कि स्कूल आते समय हमने क्या-क्या देखा, उस अध्यापिका के बारे में हो सकता था जो स्कूल में किसी बच्चे पर गुस्सा कर रही हो, या फिर उन बच्चों के बारे में भी हो सकता था जो कि बड़े शान्त भाव से बैठे हैं या खेलना चाह रहे हैं।

सातवें अघ्याय में बताया गया है कि इंजीनियर या डॉक्टर बनने के लिए कौन-कौन-सी प्रवेश परीक्षाएँ पास करनी पड़ती हैं और यह भी कि इंजीनियर करते क्या हैं। अध्याय यह सन्देश देता प्रतीत होता है कि इस शिक्षा प्रणाली में आए सभी बच्चों को यह जानना चाहिए कि उन्हें पीईटी या पीएमटी की तैयारी तो करनी ही है। इस देश में जहाँ कि बच्चों के स्कूल जाने की अवधि का औसत चार वर्ष मात्र है वहाँ यह सूचना आखिर किस काम की? बच्चे भविष्य का कोई प्रयोजन लेकर स्कूल नहीं आते, और ऐसे अस्पष्ट विचार कि ‘शिक्षा आपके जीवन में मदद करेगी’ अथवा ‘डाक्टर या इंजीनियर बनना है’ छोटे बच्चों के लिए तो बहुत दूर की कौड़ी ही हैं। स्कूल का वर्तमान अनुभव बताता है कि आवश्यकता इस बात की है कि बच्चे में स्कूल आने की ललक को बढ़ाया जाए। स्कूल यदि कुछ नया सीख लेने से उत्पन्न हुई उपलब्धि की भावना बच्चे को देने में कामयाब हो जाएँ तो बच्चा अपने आप स्कूल दौड़ा चला आएगा। यह कोरी काल्पनिक बातें नहीं बल्कि स्कूल में प्राप्त होने वाले दिन-प्रतिदिन के अनुभव और एहसास हैं जो यह तय करते हैं कि क्या ‘शिक्षा’ उपयोगी है, सार्थक है या व्यर्थ है, निरर्थक है।

बारहवाँ अध्याय एक कविता है जिसमें वर्णन किया गया है कि बसन्त ऋतु में लिलि, पैंज़ी और डैफोडिल के फूल किस तरह खिल रहे हैं। यह अध्याय उन फूलों के नाम और हिज्जे (स्पेलिंग) का बोझ लिए हुए हैं जिन्हें इन बच्चों ने कभी देखा भी नहीं है और बहुत सम्भव है कि अध्यापक भी उन्हें यह न बता पाएँ कि ये फूल आखिर दिखते कैसे हैं और इनका रंग-रूप होता कैसा है।

तेरहवें अध्याय का शीर्षक है ‘वी ऑल मेक मिस्टेक्स’। इसमें महीनों के नाम बताए गए हैं। यह बताया गया है कि किस महीने में कितने दिन होते हैं, क्वाटर पास्ट टेन, क्वाटर टू टेन, और हाफ पास्ट टेन इत्यादि क्या होता है। इस अध्याय का शीर्षक इसमें दी गई उस कहानी के एक अंश से लिया गया है जिसमें एक बच्चा ‘वॉच’ को ‘क्लॉक’ कहता है। वक्ता द्वारा यह बताने के दौरान ही कि मिनट में कितने सेकण्ड, घण्टे में कितने मिनट और किस महीने में कितने दिन होते हैं, यकायक ही यह अध्याय यह कहते हुए खत्म कर दिया जाता है कि उसे हाफ पास्ट टेन पर ट्रेन पकड़नी है इसलिए उसे निकल लेना चाहिए। एक अन्य अध्याय है जिसमें चर्चा की गई है कि कॉमन नाउन और प्रॉपर नाउन क्या होते हैं।

यह सीखना कि अँग्रेज़ी में समय कैसे बोला और बताया जाए, यह जानना कि किस महीने में कितने दिन होते हैं और यह समझ लेना कि नाउन क्या होती है, निश्चित रूप से सुसंगत है, औचित्यपूर्ण है, किन्तु यहाँ जो पद्धति अपनाई गई है वह समस्या मूलक है। अध्याय इन विषयों पर की गई कोरी सैद्धान्तिक चर्चा बन कर रह गया है। ऐसे अध्यायों की समस्या स्पष्ट है; ग्रैमर को तो अभ्यास व इस्तेमाल से हासिल किए जाने की आवश्यकता है। एक बार भाषा पर पकड़ हासिल हो जाए तो फिर ज़रूर उसके सिद्धान्त व अवधारणाओं को समझने का प्रयास किया जा सकता है।

इसके अतिरिक्त, एक नई भाषा सिखाए जाते समय हमें बच्चे के सामान्य ज्ञान की जाँच करने और ऐसी बातों तथा तौर-तरीकों से बचने की आवश्यक्ता है जिसमें बच्चों को रट्टा लगाना पड़े। भाषा तो बस समझना और अभिव्यक्त करना है। समझना तब और सरल हो जाता है जब उसे उन बातों के साथ जोड़ दिया जाता है जो हमारे जीवन में आम तौर पर घटती रहती हैं। ‘जाना-पहचानापन’ या ‘रोज़मर्रा की बात’ हमारे वे अनुभव हैं जो दिन-प्रतिदिन हमारे सामने आते रहते हैं और ये उन एहसासों व उन लोगों से जुड़े होते हैं जिन्हें हम जानते हैं या जिनसे सम्बन्ध रखते हैं

‘कहानी’ की परिभाषा को अगर थोड़ा फैला दिया जाए तो शायद सोलह में से तीन पाठ कहानी की श्रेणी में आ सकते हैं। ये पाठ हैं एक लड़की द्वारा एक पेड़ को काटे जाने से बचाना, स्वामी विवेकानन्द की बन्दर की घुड़की वाली कहानी ‘फेसिंग द प्रॉब्लम’, और घायल हंस को बचाने के लिए राजकुमार सिद्धार्थ का ‘सेवियर’ बनना।
इस पूरी पुस्तक में व्याप्त एक उल्लेखनीय बात यह है कि ऐसा लगता है कि पुस्तक के लेखक यह मानते हैं कि कोई अवधारणा यदि संवाद रूप में दी जाए और बच्चों को उस परिचर्चा में शामिल कर लिया जाए तो वह ग्राह्य हो जाएगी। जब कि, यह समझने की आवश्यकता है कि कोई भाषा पढ़ाए जाने के लिए, अवधारणाओं या विचारों को बच्चों के परस्पर संवाद के रूप में थोपना नहीं चाहिए, बल्कि बच्चों के ही वास्तविक परिसंवाद को पाठ्य पुस्तक में शामिल किया जाना चाहिए।

यह सच है कि परिवेश, पारिवारिक परम्पराओं, सामाजिक ताने-बाने और भौगोलिक स्थितियों में भिन्नताओं के चलते कोई ऐसी एक पुस्तक नहीं हो सकती जिसमें इन तमाम चीज़ों का समावेश किया गया हो, या जो सरकारी स्कूलों में आने वाले तमाम बच्चों के लिए प्रासंगिक हो। तथापि, पाठ्य पुस्तक में बच्चों के लिए दिलचस्प कहानियाँ और इन पुस्तकों का प्रयोग करने वाले बच्चों से मिलते-जुलते चित्र देकर उक्त कठिनाइयों को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। चरित्र और स्थान भले ही भिन्न रहें किन्तु भावनाएँ और इच्छाएँ तो एक समान ही रहेंगी। अन्य समुदायों के बच्चों की कहानियाँ इनमें जोड़कर पुस्तक को और भी प्रभावकारी बनाया जा सकता है।

बहुत-से पाठ कई सारे जटिल वाक्यों से भरे पड़े हैं। उदाहरण के लिए “Lal Bahadur Shastri, commonly called ‘babuji’ within his family, was known for his simplicity, honesty, determination and patriotism”, “This is in response to your letter in which you wanted to get detailed account of Diwali and Eid celiberations”…। इन पाठों में दी गई जानकारी को दोबारा इस तरह से लिखे जाने की आवश्यकता है कि ये बच्चों के लिए सुबोध व सुगम्य रहें। यह प्रयास यदि राज्य स्तर पर सुयोग्य विशेषज्ञों द्वारा होता हुआ नहीं दीख रहा है तो फिर स्कूल स्तर पर इसका होना तो दुष्कर है ही।

बच्चों को पढ़ाना हल्के-से नहीं लिया जा सकता क्योंकि हम बच्चों की सोच की दशा और दिशा को प्रभावित कर रहे होते हैं। किसी पाठ्य पुस्तक को बनाना एक बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी वाला काम है क्योंकि यह एक बहुत बड़े वर्ग (अध्यापकों तथा बच्चों) को प्रभावित करने जा रही होती है। सरकारी पाठ्य पुस्तकें प्रमुखत: सरकारी स्कूलों में इस्तेमाल होती हैं और इन स्कूलों में आने वाले बच्चे सामान्यत: ऐसे परिवारों के होते हैं जो किसी छोटे-से प्राइवेट स्कूल में जाने के लिए अस्सी रुपए महीने का खर्च भी नहीं उठा सकते। किन्तु शिक्षा प्रणाली के माध्यम से समाज जीवन के ऐसे तौर-तरीके थोपना जारी रखे हुए है जो स्वीकार्य मान लिए गए हैं। ये मध्यम वर्ग तथा उच्च आय वर्ग की ही सोच को प्रतिबिम्बित करते हैं।

इस पुस्तक की विषय-वस्तु के माध्यम से दी जा रही जानकारी के सन्दर्भ में भी इसका मूल्यांकन किए जाने की आवश्यकता है – “He gave a befitting reply to Pakistan’s invasion of India in 1965”. “We got our houses whitewashed on diwali. Everyone put on new clothes. We ate sweats and let off fireworks.” “My dear students, besides these (engineer, doctor, teacher) professions there are so many other good and challenging services as well. We’ll discuss about them sometime later.”.”
ऐसी पुस्तकों को पढ़ने वाले बच्चों के लिए देश की स्वतंत्रता का क्या अर्थ होता है, क्या वे वास्तव में स्वतंत्र हैं, स्वतंत्रता से वे क्या समझें, और क्या यह स्वतंत्रता पाँच वर्ष में एक बार मतदान करने देने का पर्याय मात्र है? किसी अन्य से अपने घर की पुताई करवा लेना, या नए कपड़े खरीदने की हैसियत हो जाना, क्या जीने का यही एकमात्र तरीका होता है? क्या यह पुस्तक बच्चों को यह महसूस करने का खुलापन प्रदान करती है कि चूँकि घर में कोई भाई या बहन बीमार पड़ गया था और परिवार की जमा-पूँजी उसके इलाज में चली गई थी, इसलिए हम इस दिवाली पर नए कपड़े नहीं सिलवा सके थे? सच तो यह है कि स्कूलों का समूचा वातावरण और साथ ही ये पाठ्य पुस्तकें भी इन गरीब बच्चों के लिए अपनेपन का एहसास तो छोड़िए, आमतौर पर दुराव ही पैदा करती हैं।

और, यदि बच्चे गरीब पृष्ठभूमि के नहीं हैं तो भी देशभक्ति का अर्थ केवल अपनी भौगोलिक सीमा तक सीमित होना और दूसरों के प्रति असहिष्णु हो जाना, संसाधन व सम्पदा से सम्बन्धित हिंसा, समाज में स्त्रियों की भूमिका, ‘परिवार’ की पवित्रता, और इंजीनियर या डॉक्टर बनना ही लोगों का रोल-मॉडल होना – ये ऐसी मान्यताएँ हैं जिन्हें तोड़े जाने की आवश्यकता है।

पुस्तक में दिए गए अभ्यास
पाठों का प्रश्न-उत्तर वाला भाग बच्चों के लिए स्वयं को अभिव्यक्त करने में प्रेरक या सहायक की भूमिका नहीं निभाता। कभी-कभी तो वह बड़ा बेतुका और विसंगत लगता है – ‘बच्चों को कितने दलों में बाँटा गया? दूसरी पंक्ति में चौथा लड़का कौन था? उनके साथ कौन गया?’ कई अन्य प्रश्न-उत्तर कठिन हैं और पाँचवीं के स्तर के बच्चे के लिए अनावश्यक भी हैं। काफी सम्भावना है कि अध्यापक भी उनका उत्तर व्याकरण गत रूप से सही अँग्रेज़ी में किताब में झाँके बिना न दे पाएँ – ‘अध्यापक होने के लिए कौन-सा प्रशिक्षण आवश्यक है, मल्टीमीडिया क्या होता है, घाट के बन्दरों ने भोजन कैसे पाया, इत्यादि?’ ये प्रश्न अपेक्षा करते हैं कि बच्चा व्याकरण की दृष्टि से बिलकुल शुद्ध वाक्य लिखे – “One must have a diploma in education or a degree in education to become a teacher.”, “A multimedia lesson is a lesson on the computer with audio-visual effects’ is the smallest correct answer,” “The monkeys fed on the fruits and cereals brought by the devotees.””
ऐसा नहीं है कि उत्तर कुछ खास लम्बे या कठिन हैं, किन्तु इनके लिए व्याकरण के इस्तेमाल की समझ होना आवश्यक है और शब्दों की भी, जब कि बच्चा यह सब पिछली कक्षा से लेकर आया नहीं होता है। इस स्तर पर तो बच्चे से अधिक से अधिक यही अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह प्रश्न को समझ ले और थोड़े-से शब्दों या साधारण वाक्य में उसका उत्तर दे दे।

अनेक अध्यायों के अन्त में प्रश्न पूछा गया है ‘इस कहानी/कविता से आपको क्या सीख मिलती है?’ अनेक प्रगतिवादी शिक्षा शास्त्रियों द्वारा प्रस्तुत अध्ययनों में यह दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया है कि बच्चों से यह पूछे जाने की आवश्यकता नहीं है कि उन्होंने क्या सीख ली, यह तो मूल्यों को उनके दिमाग में भरने का एक अस्वाभाविक और असहज तरीका है जो बहुत कारगर भी नहीं रहता। कहानियाँ तो बच्चों की कल्पनाशीलता को बढ़ाने, दूसरी दुनिया और दूसरे स्थानों से जुड़ने, तरह-तरह के चरित्रों की भावनाओं और उनके जीवन को जानने का एक ज़रिया होती हैं।

शब्दों के साथ उनके अर्थ को ‘मैच’ करने वाले हिस्से में कई शब्दों के दिए गए अर्थ तो शब्दों से भी अधिक जटिल और दुरूह हैं, और सचमुच आश्चर्य होता है कि इस कवायद की ज़रुरत क्या थी।
Worried – to keep thinking about unpleasant things
Sharpen – to make something sharpen
Equally – to the same degree
Remember – to keep an important fact in your mind
हर पाठ में ‘लेट अस रीड’ नाम का एक अलग खण्ड दिया गया है। यह बच्चों को अतिरिक्त पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराने के उद्देश्य से है किन्तु यह अनुभाग भी वैसी ही समस्याओं से ग्रस्त है जैसा कि मुख्य अध्याय।

कुछ ज़मीनी हकीकत

भोपाल के सरकारी स्कूलों के बच्चों पर किया गया अध्ययन बताता है कि पाँचवीं कक्षा के तीन-चौथाई से अधिक बच्चे की अँग्रेज़ी विषय की जानकारी केवल उसकी वर्णमाला को क्रम में याद रखने या जमाने तक ही सीमित है। प्रश्नों के जवाब बोर्ड से अपनी कॉपी में नकल करके लिख लेने के अलावा अपने बल-बूते अँग्रेज़ी के छोटे-छोटे शब्द तक बना पाने की क्षमता उनमें नहीं होती। और इसमें कोई सन्देह नहीं है कि ग्रामीण तथा जनजातीय क्षेत्रों के स्कूलों में तो अध्यापकों और बच्चों की स्थिति कमोबेश इससे भी बदतर ही है।

कक्षा पाँच दरअसल बच्चों के लिए भी एक खास मुकाम होता है जो कि उनके लिए माध्यमिक शाला की शिक्षा के द्वार खोलता है। ऐसे बहुत-से बच्चे जो नियमित विद्यार्थी नहीं हैं वे भी कक्षा पाँच की परीक्षा हेतु स्वाध्यायी छात्र के रूप में बैठते हैं। भले ही बच्चे इस परीक्षा में अनुत्तीर्ण न होते हों (पुस्तक की जटिलता से बचने की कोई युक्ति भिड़ा कर, या जैसा कि अकसर होता है, परीक्षा के दौरान अध्यापक द्वारा मदद किए जाने के कारण), किन्तु इससे बच्चों की भाषा सम्बन्धी योग्यता में कोई बढ़त नहीं हो जाती।

अत: यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि पढ़ाने और पढ़ने की प्रक्रिया रुचिकर हो और बच्चे के लिए प्रासंगिक हो, उससे सम्बद्ध हो; और वह बच्चों को ही असम्बद्ध कर देने का ज़रिया न बन जाए। कक्षा पाँच की पुस्तकों पर विशेष रूप से पुनर्विचार करने की, उनकी समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है। इस प्रयास के साथ इन्हें नए स्वरुप में डिज़ाइन किए जाने की आवश्यकता है ताकि वे बच्चे इन्हें समझ तो सकें जिनके लिए ये बनाई जा रही हैं। किन्तु, किसी अनजान भाषा को सीखने की पद्धति में आवश्यक है कि उस भाषा की झलक पहली कक्षा की पाठ्य पुस्तकों से ही आरम्भ हो जाए, साथ ही आवश्यक है कि पुस्तक का सारा ध्यान सामग्री की समुचितता पर हो, उसके सुनने और बोलने एवं अपनी बात को अभिव्यक्त करने के लिए उस भाषा को साधन के रूप में प्रयुक्त करने पर हो।


शिवानी तनेजा: मुस्कान संस्था, भोपाल में कार्यरत। मुस्कान, बस्तियों में रहने वाले बच्चों के लिए शिक्षा और शिक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों जैसे स्वाश्थ्य, रोजगार और स्वच्छता आदि पर काम करने वाली भोपाल स्थित स्वयंसेवी संस्था है।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: अचलेश शर्मा: बैंक में राजभाषा अधिकारी रहे हैं। अवकाश प्राप्ति के बाद स्वतंत्र रूप से अनुवाद कार्य करते हैं। मेरठ में निवास।
सभी चित्र: इंग्लिश रीडर किताब से।

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