चलते-चलते

By कमल किशोर मालवीय

भाषा को शब्द उसके परिवेश और वातावरण से मिलते हैं। जब कभी बात उदाहरण की आती है तो भले ही भाषा की कक्षा हो, आसपास के शब्द ही सबसे पहले दिमाग में चले आते हैं।

कई सालों से मुस्कान संस्था के भोपाल स्थित बंजारी बस्ती सेंटर पर बच्चों को पढ़ाने का काम करता हूँ। पारधी समुदाय के बच्चे यहाँ आते हैं। इन बच्चों के माता-पिता पन्नी बीनने का काम करते हैं।

बच्चे पढ़ने में एक-से नहीं हैं। कक्षा में स्तरानुसार बच्चों के तीन समूह हैं।
स्तर-1. पढ़ना-लिखना, दोनों जानते हैं।
स्तर-2. सिर्फ छोटी सरल कहानियाँ पढ़ना जानते हैं।
स्तर-3. पढ़ना सीख रहे हैं।

आज मात्र 17 बच्चे उपस्थित थे, 10 लड़के और 7 लड़कियाँ। आज भाषा के अन्तर्गत कहानी हलीम चला चाँद पर पढ़ाने की योजना थी। इस कहानी को सुनाने के पीछे का उद्देश्य बच्चों की कल्पनाशीलता को मौका देना था। कहानी सुनाने के बाद बच्चों से कहानी पर चर्चा शु डिग्री की।

मैंने बच्चों से पूछा, “इस कहानी में आप लोगों को सबसेे अच्छा क्या लगा?”
मनदीप ने कहा, “रॉकेट में हलीम का ऊपर जाना मुझे अच्छा लगा। मुझे लग रहा था कि मैं जा रहा हूँ।”

रोतिशना: हलीम वहाँ घूमकर आया। मुझे लग रहा है, मैं भी चली जाऊँ।
राहुल: क्या सच में कारखाने में रॉकेट मिल सकता है? कितने का मिलता होगा?
राधिका: हलीम चाँद से घूमकर वापस आ गया, ये अच्छा लगा।

मैंने बच्चों से फिर पूछा कि अगर हम लोग भी हलीम की तरह चाँद पर जाना चाहें तो कैसे जा सकते हैं।
कुछ पल के लिए तो कक्षा में जैसे सन्नाटा छा गया। फिर एक आवाज़ आई, आवाज़ थी रिहान की, उछलते हुए, “चिलगाड़ा (हवाई-जहाज़) से चाँद पर जा सकता हूँ।”
अब ऐसा लगा जैसे बच्चों को चाँद पर पहुँचने का उपाय मिल गया हो — सभी अपने-अपने तर्क लगाते हुए बताने लगे।

गगन: रॉकेट से।
राधेपाल: गैस वाले फुग्गे से।
राधिका: हेलीकॉप्टर से।
बाकी बच्चे चुप थे।
इस पर बच्चों को वापस कहानी पर ले गए और कहानी को समझने पर चर्चा शु डिग्री की। मैंने पूछा कि “इस कहानी में कहीं कुछ ऐसा तो नहीं लगा कि समझ नहीं आया हो, कोई लाइन या कोई शब्द जिसका मतलब समझ न आया हो?”
बच्चों से उत्तर मिला, “नहीं!”

मैंने एक बार फिर से पूछा, “कोई ऐसा शब्द जो अलग लगा हो?”
रोतिशना बोली, “चलते-चलते, दो बार क्यों लिखा है? इसका क्या मतलब है?”
मैंने कहा, “हम सब मिलकर इसका उत्तर ढूँढ़ते हैं कि आखिर एक ही शब्द को दो बार कब और क्यों बोला जाता है।” फिर कहा, “ऐसे और शब्द बताओ जो दो बार बोले जाते हैं।”

बस, एक के बाद एक जवाब आना शुरु हो गए। बच्चों के द्वारा बोले गए शब्दों को मैं बोर्ड पर लिखने लगा।
मरत-मरते, पीते-पीते, मारते-मारते, जाते-जाते, खाते-खाते, लिखते-लिखते, पढ़ते-पढ़ते, उड़ते-उड़ते, चिपकाते-चिपकाते।
जब सारे बच्चे कुछ-कुछ शब्द बोल रहे थे तभी चार साल की बच्ची तानिया ने दो जवाब दिए — पानी भरते-भरते, रोटी बनाते-बनाते। इतने सरल तरीके से तानिया ने खेलते हुए वाक्य बोला कि बाकी बच्चे उसकी तरफ देखने लगे।

मैंने तानिया को प्रोत्साहित करते हुए कहा, “और क्या, और बोलो।” तो उसने कहा, “दा डिग्री पीते-पीते मरी गयो।”
जिस तरह तानिया ने सन्दर्भ को पकड़ते हुए वाक्य बोले, इससे लगता है कि भाषा की कक्षा में जो भी वाक्य बच्चों के लिए लिखा जाए वो अर्थपूर्ण होना चाहिए।
कक्षा में चल रही इस गतिविधि को आगे बढ़ाते हुए और बच्चों से प्रश्न किए। मैंने बच्चों से पूछा, “हम कब इस तरह बोलते हैं?” उदाहरण देते हुए, “जैसे कि तानिया ने कहा, ‘दारु पीते-पीते मरी गयो।’ ”
बच्चे एक के बाद एक तत्परता से बोलने लगे।

राधेपाल: चाली-चाली ने मरी गयो।
गगन: चाली-चाली ने गोेड़े टूटी गयो।

रेसू: एक दिन रोड से जई रओ थो तो बस से मरता-मरता बची गयो।
मनदीप: लिखते-लिखते थाकी गयो।
राधिका: रोटी बनाते-बनाते थक गई।
राहुल: एक आदमी को पुलिस मारते-मारते ले गई।
रोतिशना: पैदल चालीने-चालीने थाकी गई।

इन सब वाक्यों को बोर्ड पर लिखा गया। फिर हर एक वाक्य में जहाँ शब्द दो बार आए उनको अंडर-लाइन किया और बच्चों को कहा, “सोचो हम कब ये बात बोल रहे हैं।”

मैं: तानिया ने कहा कि दारु पीते-पीते मरी गयो। तो ये जो आदमी दा डिग्री पी रहा था, कब मरा?
गगन: जब दा डिग्री ज़्यादा पी ली तो मर गया।
मैं: जिस तरह रोतिशना ने कहा पैदल चालीने-चालीने थाकी गई।
रोतिशना: भैया उस दिन हम बहुत दूर तक बीनने गए थे। तो थाकी गई।
मैं: क्या रोज़ इतनी दूर जाते हो?
रोतिशना: नहीं। रोज़ तो आसपास ही बीनते हैं।
मैं: क्या तब भी इतना ही थक जाती हो?
रोतिशना: नहीं।
मैं: फिर उस दिन ऐसा क्या हुआ जिससे तुम थक गईं?
रोतिशना: उस दिन रोज़ से गल्लाक-गल्लाक दूर पैदल चाली ने गई।

इतने में राधेपाल बोला: हाँ, समझ आ गया, हम जब भी कोई काम को बहुत ज़्यादा करते हैं तो इस तरह उसे दो बार बोला जाता है।

राहुल: हाँ भैया, जब हम अपनी ताकत से ज़्यादा काम करते हैं तो उसे बताने के लिए या लम्बा चलाने के लिए दो बार बोलते हैं।

मैंने और बच्चों की तरफ देखते हुए कहा, “तो ऐसा लग रहा है कि जब किसी काम को ज़्यादा या लगातार ज़्यादा समय तक किया गया हो तो उसे दो बार बोला जाता है।”


कमल किशोर मालवीय: मुस्कान संस्था, भोपाल के साथ कार्य करते हैं।
सभी चित्र: प्रशान्त सोनी: पेंटर और इलस्ट्रेटर। विद्या भवन एजुकेशन रिसोर्स सेंटर, उदयपुर में कार्यरत।

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